उप सभापति के चुनाव में छिपा है राजनीतिक संकेत

राज्यसभा में उप सभापति का चुनाव, महज किसी की जीत या किसी की हार नहीं है। गौर करने वाली बात यह नहीं कि जीता कौन? बल्कि, गौर करने वाली बात ये है कि जीत की रणनीति क्या थी? कुनबा भड़क जाने के आए रोज प्रकाशित हो रही अटकलो के बीच भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की एकजुटता और महागठबंधन की चाहत रखने वाली कॉग्रेस के नेतृत्व में कुनबे का बिखराव। भविष्य की राजनीति के लिए बड़ा संदेश है। दरअसल, यहीं वह रणनीति जिसमें 2019 के लोकसभा चुनाव की तस्वीर लगना शेष है।

उच्च सदन में विपक्ष की एकजुटता ध्वस्त
एनडीए ने अपने कुनबे को एकजुट रखने के साथ भविष्य के दोस्त भी तलाशे हैं। रणनीति के जानकार मानतें हैं कि यही वह हालात है जो लोकसभा चुनाव और उसके बाद की स्थिति में एनडीएम की मददगार साबित होने वाली है। दूसरी तरफ उच्च सदन में अपनी ताकत से सरकार को डराने वाली विपक्ष की एकजुटता को ध्वस्त करके भाजपा ने राजनीतिक चतुराई के प्रौढ़ संकेत दे दिएं हैं। भाजपा का संकेत स्पष्ट है कि जरूरत पड़ने पर वह उच्च सदन में भी जीत का समीकरण बना सकती है।
अंकगणित पर भारी पड़ा राजनीतिक गणित
उप सभापति के पद परराज्यसभा में जीत दर्ज कर भाजपा ने साबित कर दिया है कि राजनीति की गणित कैसे अंकगणित पर भारी पड़ जाता है। दरअसल यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक वर्चस्व और रणनीति की प्रतिष्ठा, दोनो पर दाव लगी थी। एक ओर जाहां कांग्रेस का नेतृत्व अन्य विपक्षी दलों के साथ रणनीति में उलझा रह गया। वहीं भाजपा ने ऐसे उम्मीदवार पर दांव लगा दिये जिसे विपक्षी खेमे के निर्णायक बीजद का समर्थन भी हासिल हो गया। साथ ही अपने नाराज दोनों सहयोगी दल यानी शिवसेना व अकाली दल को भी साधने में भाजपा के रणनीतिकार सफल हो गये। इतना ही नहीं बल्कि सत्तापक्ष को विपक्ष के खेमे से भी एक सांसद का समर्थन मिल जाना चौका देता है।
कुनबे को एकजुट रखना आसान नहीं
जानकार मानतें हैं कि भाजपा की रणनीति केवल उप सभापति के चुनाव तक ही सीमित नहीं थी। बल्कि, प्ररोक्ष रूप से इसमें लोकसभा चुनाव की रणनीति का भी झलक देखने को मिल जाता है। कहतें हैं कि यहीं वह वजह है कि इसका कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने स्वयं संभाले हुए था। अन्नाद्रमुक, टीआरएस व बीजद का समर्थन हासिल करना आसान नहीं था, जबकि भाजपा इन तीनों दलों की सत्ता वाले राज्यों में खुद की ताकत बढ़ाकर चुनौती देने की तैयारी कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह ने नवीन पटनायक से बात करके यह संदेश दे ही दिया है कि आने वाले समय में भाजपा व बीजद में नया रिश्ता भी बन सकता है।
तमिलनाडु में नए समीकरण के संकेत
लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के साथ रही अन्नाद्रमुक ने अब राज्यसभा में भी सत्तापक्ष का साथ देकर नए समीकरण के संकेत दे दिएं हैं। तमिलनाडु की राजनीति में अन्नाद्रमुक की धुर विरोधी द्रमुक के कांग्रेस के साथ होने से लोकसभा चुनाव में भाजपा व अन्नाद्रमुक के बीच गठबंधन भी हो सकता है। तेलंगाना की सत्तारूढ़ टीआरएस ने भी भविष्य की रणनीति को देखते हुए सत्तापक्ष का समर्थन करने का फैसला लिया। लब्बोलुआब ये कि चुनाव तो उप सभापति के हुए। पर, संकेत भविष्य के राजनीति का दे गया।

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